वसंत पंचमी

On December 04

वसंत पंचमी

सरस्वती माता ज्ञान विज्ञान ,कला, संगीत की देवी मानी जाती है I  वसंत पंचमी को

ग्रंथो मे इसका आवीरभावा दिवस माना गया है I वसंत पंचमी सरस्वती माता की

प्राकट्य की तिथि होने के कारन इस दिन को धोम धाम से मनाते है . इस से

संबन्धित कथा यह है - संसार निर्माता ब्राहमा ने जब अपनी संसार को मूक नीरस

देखा , उन्होने अपने कमंडल का जल मंत्र पड़करपृथ्वी पर डाला और इस से धरती पर हारैयाली छा गयी I हरी भरी धरा पर तेजोमानी देवी प्रगट हुई . देवी के हाथ मे वीणा और पुस्तक थी Iविणा के मादयम् से संसार की मुकता और पुस्तक से अज्ञान का अंधकार दूर कर दिया I इस प्रकार सरस्वती वाणी और विद्या की देवी मानी जाती है I  इतिहास के प्रसिद विदवान सरस्वती की आराधना से ही कवित्व साहित्यिक अपनी मे निपूर्ण होते है I महर्षि  वाल्मीकि को आदिकवि बनने का मोका मिला इनके के अनुगृह के कारण ही वाल्मीकि

ने महाकाव्या रामायण की रचना की I  शास्त्रो मे वसंत पंचमी को श्री पंचमी भी कहा गया है श्री मतलब - सम्रुधी

की देवी लक्ष्मी I तंत्र शास्त्र मे माघ शुल्क को पंचमी को लक्ष्मी की उपासना की जाती है एसा माना जाता है की लक्ष्मी माता पंचमी को प्रसन मुद्रा मे होती है I लक्ष्मी माता  और सरस्वती दोनो एकचित होती है दोनो की प्रिय तिथि होने के कारण पंचमी महा पर्व बन गयी है I इस दिन दोनो के पूजन से विद्या और सुख की प्राप्ति होती है  वसंत पंचमी को इतना शुभ माना गया है की कोई भी शुभ काम किया जा सकता है सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी I

शुभा रतिः प्रकर्त्तव्या वसन्तोज्ज्वलभूषणा ।
नृत्यमाना शुभा देवी समस्ताभरणैर्युता ॥
वीणावादनशीला च मदकर्पूरचर्चिता।'
[
'कामदेवस्तु कर्त्तव्यो रूपेणाप्रतिमो भुवि।
अष्टबाहुः स कर्त्तव्यः शंखपद्मविभूषणः॥

चापबाणकरश्चैव मदादञ्चितलोचनः।
रतिः प्रतिस्तथा शक्तिर्मदशक्ति-स्तथोज्ज्वला॥

चतस्त्रस्तस्य कर्त्तव्याः पत्न्यो रूपमनोहराः।
चत्वाश्च करास्तस्य कार्या भार्यास्तनोपगाः॥

पौराणिक महत्व

रावण द्वारा सीता के हरण के बाद श्रीराम उसकी खोज में दक्षिण की ओर बढ़े। इसमें जिन स्थानों पर वे गये, उनमें दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नामक भीलनी रहती थी। जब राम उसकी कुटिया में पधारे, तो वह सुध-बुध खो बैठी और चख-चखकर मीठे बेर राम जी को खिलाने लगी। प्रेम में पगे झूठे बेरों वाली इस घटना को रामकथा के सभी गायकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया। दंडकारण्य का वह क्षेत्र इन दिनों गुजरात और मध्य प्रदेश में फैला है। गुजरात के डांग जिले में वह स्थान है जहां शबरी मां का आश्रम था। वसंत पंचमी के दिन ही रामचंद्र जी वहां आये थे। उस क्षेत्र के वनवासी आज भी एक शिला को पूजते हैं, जिसके बारे में उनकी श्रध्दा है कि श्रीराम आकर यहीं बैठे थे। वहां शबरी माता का मंदिर भी है।



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